(दीपक कुमार त्यागी) समय की मांग है 'लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984' में संशोधन

Posted at : 2020-01-16 05:23:15

हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था का झंडा बेहद बुलंद है, देश में इसकी जड़ें बेहद गहरी हैं। हमारे वतन में लोगों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वंतत्रता प्राप्त है, किसी मसले पर सरकार से सहमत नहीं होने पर हम लोग सरकार की कार्यप्रणाली का विरोध व आलोचना शांतिपूर्ण गांधीवादी ढंग से करने के लिए स्वंतत्र हैं। हमें अधिकार है कि हम लोग सभ्य तरीकों से सार्वजनिक रूप से भी सरकार के कार्यों से असहमति व्यक्त कर सकते हैं। लेकिन अगर हम सरकार की नीतियों के विरोध व आलोचना के नाम पर अपने ही देश की बहुमूल्य सार्वजनिक व निजी सम्पत्ति को आगजनी व तोड़फोड़ करके नुकसान करेंगे, तो हम सभी को यह भी जान लेना चाहिए कि हमारे देश में नियम, कायदे व कानून से परिपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था हमको कभी भी कानून अपने हाथ में लेकर हिंसा और तोड़फोड़ करने का अधिकार नहीं देती है। अगर हम वास्तव में अपने देश से प्यार करते हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सम्मान करते हैं तो यह बेहतरीन स्वंतत्र व्यवस्था हम सभी को नियम कायदे व कानून का सम्मान करने के लिए प्रेरित करती है ना कि देश की लोक व निजी संपत्ति को नुकसान करने के लिए प्रेरित करती है। हमारे प्यारे भारतीय लोकतंत्र में किसी भी विषय पर सरकार से असहमत होने पर हमको शांतिपूर्ण और अहिंसक गांधीवादी तरीके से विरोध प्रकट करने का पूर्ण अधिकार हर वक्त प्राप्त है। देश के प्रत्येक वासिंदे के साथ-साथ, हर संगठन, सत्ता पक्ष, विपक्ष और सभी राजनीतिक दलों को गांधीवादी तरीकों से शांतिपूर्ण ढंग से जनता को परेशान करें बिना धरना प्रदर्शन करने का अधिकार प्रदान है। लेकिन अगर इस दौरान हिंसा, आगजनी व तोड़फोड़ करके सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, तो यह देश के मौजूदा कानून के अनुसार दंडनीय अपराध है। लेकिन फिर भी हमारे प्यारे देश में आयेदिन धरना प्रदर्शन के दौरान लोक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना देश में फैशन बनता जा रहा है। हालात इतने बदतर होते जा रहे है कि अब तो धरना प्रदर्शन करने वाली भीड़ एक माह व्यतीत होने के बाद भी दिल्ली और उत्तर प्रदेश को जोड़ने वाले बेहद व्यस्त मार्ग को जामकर के बैठ जाती है और हमारा सिस्टम कहीं ना कहीं किसी तरह की जाति व धर्म की राजनीति से प्रभावित होकर हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहता है, वो धरनारत इन प्रदर्शनकारियों से संवाद करने तक में विश्वास नहीं रखता है। हालांकि प्रदर्शनकारियों की इस भीड़ की जिद के चलते रोजाना लाखों लोगों को कई घंटे जाम से झूझना पड़ता है और सरकार व आम लोगों का भारी वित्तीय नुकसान अलग होता है।