( दीपक कुमार त्यागी) देश में धर्म व संस्कृति पर हावी होता बाजारवाद

Posted at : 2019-10-17 06:12:32

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बाजारवाद और इसकी ताकतवर व्यवस्था के प्रभाव से समाज का कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहा है। हालात यह हो गये हैं कि सनातन धर्म की संस्कृति व त्यौहारों की बेहद गौरवशाली परम्पराएं भी बाजारवाद के आसान शिकार बन गये हैं। देश में स्थिति ऐसी हो गयी है कि अब तो हम लोग किसी दूसरी संस्कृति व विचारों को भी बिना सोचे समझे बाजार के जादू के चलते अपना रहे हैं। बाजारवाद ने सभी सीमाओं को तोडऩे का काम किया हैं। लेकिन विचारयोग्य बात यह है कि देश में बन गये बाजारवाद और अर्थवाद की संस्कृति के इस संक्रमण काल में भी भारतीय संस्कृति व मूल्यों के प्रति समर्पित एवं संवेदनशील बने रहना बहुत बड़ी चुनौती की बात हो गयी है। हालांकि यह बाजारवाद की मेहरबानी है जिसने ने 21वीं सदीं के भारत में ऐसे हजारों-लाखों युवा तैयार कर दिए हैं, जो इस बाजारवाद से रोजाना लाखों-करोड़ों कमा रहे है और उसी कमाई पर दिये गये टैक्स के पैसा खर्च कर राष्ट्र विकास के नित नये आयाम स्थापित कर रहा हैं। इस बाजारवाद व पाश्चात्य मानसिकता के प्रभाव वाले दौर में भी हमकों अपनी गौरवशाली भारतीय संस्कृति को बचायें रखना है। वैसे आज देश में अलग तरह का राष्ट्रवाद चरम पर हैं जिसका आधार बहुत ही तेजी से दिनप्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है। लेकिन उसके बाद भी शहरी परिवेश में सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य अंग्रेजी शैली कुछ ज्यादा हावी हुई है, लेकिन अच्छी बात यह है कि देश के ग्रामीण परिवेश वाले क्षेत्रों में अब भी प्राचीन भारतीय संस्कृति का बोलबाला है उसकी नींव मजबूत है। लेकिन बाजारवाद के प्रभाव से वो भी अछूती नहीं रही हैं।